सुख और दुःख जिंदगी का हिस्सा है, इसे स्वीकार कर जीएं जीवन…

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– स्पर्श क्लिनिक से मिल रहा मानसिक समस्याओं का निदान

(विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस विशेष)

सरगुजा / अंबिकापुर, 9 सितंबर 2022, अंबिकापुर की रहने वाली 35 वर्षीय सुनीता (परिवर्तित नाम) कभी काफी परेशान थीं। उन्हें अपनी जिंदगी बेरंग और बोझ लगने लगी थी। इसलिए उनके मन में अपनी जिंदगी को खत्म करने संबंधी विचार आने लगे थे। परंतु उसके भाई ने समय पर सुनीता के मनोस्थिति की पहचान कर ली जिसके कारण उसकी जान बच गई। अस्पताल में मनोचिकित्सकों द्वारा मिले परामर्श से उसमें जीवन जीने की ललक भी जाग गई है। आज सुनीता सामान्य और खुशहाल जीवन जी रही हैं और अपनी छोटी सी बच्ची की परवरिश करने को तैयार हैं। स्पर्श क्लिनिक नवापारा में सुनीता जैसे ही आत्महत्या का प्रयास करने वाले लोगों या आत्महत्या का विचार रखने वाले अन्य लोगों की मानसिक समस्याओं का इलाज किया जा रहा है। इससे ना सिर्फ लोगों की मानसिक परेशानियां खत्म हो रही हैं बल्कि उनमें जीवन जीने की ललक भी जाग रही है।

‘जो कुछ भी हुआ है उसको स्वीकार करिए थोड़ा समय लगेगा’ ने दी प्रेरणा – सुनीता कहती हैं: “मेरी जिंदगी में अब तक बहुत उतार चढ़ाव आए हैं। बचपन में पिता का बीमारी की वजह से निधन हो गया। उनके देहांत के बाद मेरी मां पर मेरे और दो छोटे भाईयों की परवरिश का बोझ आ गया। किसी तरह मां ने हमें पालना शुरू किया परंतु घर में पैसों की तंगी थी। किसी तरह मैंने सरकारी स्कूल से बारहवीं तक ही पढ़ाई कर नौकरी करने लगी। मैंने नौकरी कर भाइयों को पढ़ाया। मेरी भी जिंदगी में खुशियां आई, मेरी शादी एक समझदार लड़के से हुई। मगर एक शाम घर आते वक्त मेरे पति की एक्सीडेंट में मौत हो गई।“

आगे सुनीता ने बताया: “मेरी जिंदगी संभली ही थी की दोबारा मेरे साथ यह हादसा हो गया। उस वक्त मुझे लगा मेरी पूरी दुनिया उजड़ गई थी । जीने की उम्मीद खत्म हो गई थी। मन में बस यही विचार आता था कि मैं कैसे जी पाऊंगी, बच्ची को कैसे पालूंगी। मन में खुद को नुकसान पहुंचाने के ख्याल आते थे। तब मेरे भाइयों ने मुझे हिम्मत दी और मुझे स्पर्श क्लिनिक लेकर आए। वहां मेरी काउंसिलिंग हुई और चिकित्सकों ने मुझे बताया “आपके साथ जो कुछ भी हुआ है उसको स्वीकार करिए थोड़ा समय लगेगा आपके घाव भरने में लेकिन अब आपको अपनी बेटी के लिए जीना है। उनके द्वारा कही गई इस बाद से मुझे प्रेरणा मिली। मैं स्वीकार कर चुकी हूं मेरे पति अब लौटकर वापस नहीं आयेंगे, उनकी कमी हमेशा महसूस होगी लेकिन मुझे अपनी बेटी की परवरिश करनी है मुझे में उम्मीद जगी है अपनी बेटी के साथ जीने की ललक भी। सुख और दुःख हमारी जिंदगी का हिस्सा है”

समझाया जीवन और मृत्यु तो एक हकीकत है- नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज (निमहांस) द्वारा गेटकीपर ट्रेनिंगसे प्रशिक्षित मनोचिकित्सक नर्स नीतू केसरी ने बताया: “कई माह पहले सुनीता जब उनके पास आई थी तो एकदम शांत, चेहरे पर उदासी, मायूसी, चिंता और शारीरिक दुर्बलता के साथ आत्महत्या करने पर उतारू थी। ऐसा इसलिए था क्योंकि उसने अपने पति को खो दिया था। परिवारिक परिवेश भी उसका ठीक नहीं था। पति की मृत्यु के बाद ससुराल वालों का व्यवहार भी काफी बदल गया था। ऐसी परिस्थितियों में बेटी के साथ जीवन जीना उसे परेशान कर रहा था। इस वजह से सुनीता के मन में आत्महत्या करने जैसे ख्याल आ रहे थे। उस वक़्त तो मैंने किसी तरह उसको समझाया कि जीवन और मृत्यु तो एक हकीकत है जैसे दिन और रात लेकिन आत्महत्या गलत है। हमने फिर उसके परिवार के लोगों को भी उसको सकारात्मक माहौल देने के बारे में बताया। सुनीता के भाई ने उसकी मनोदशा को पहचाना था और उसे शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र लेकर आए। जहां चिकित्सकों के प्रयास से उनकी जान बच गई। मनोचिकित्सक के परामर्श और दादाजी के सहयोग से आज उनमें जीवन जीने की ललक जाग गई है। हालांकि अभी उसका इलाज जारी है।”

आत्महत्या से सम्बंधित यह हैं एन.सी.आर.बी. के आंकड़े- एन.सी.आर.बी.(राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो) 2021केआंकड़ों के अनुसार छत्तीसगढ़ में 1 लाख लोगों में 26.4 लोग आत्महत्या करते हैं जबकि पूरे भारत में 1 लाख की आबादी पर यह औसत 12 है। छत्तीसगढ़ की यह संख्या राष्ट्रीय औसत के दोगुने से भी ज्यादा हैं। तनाव चरम पर जब पहुँच जाता है तो अक्सर लोग आत्महत्या करते हैं। लेकिन अगर समय से उनकी मदद की जाए तो उन्हें बचाया जा सकता है। इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार ने आत्महयता रोकथाम का यह कार्यक्रम 2016 से शुरू किया जिसमें समुदाय के लोगों को आत्महत्या रोकने के लिए तैयार किया जा रहा है। अब तक हज़ारों लोगों की ट्रेनिंग दी जा चुकी है, जिसमें टीचर्स, विद्यार्थी, नर्स, और धर्मं गुरु भी शामिल हैं ।

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