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बलौदाबाजार. 2 अप्रैल 2022। ऑटिज्म की पहचान कर पाने में असमर्थता और जागरूकता की कमी से पीड़ित चिन्हित नहीं हो पाते हैं। विशेषकर छोटे बच्चे इससे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। इसलिए जागरूकता बेहद जरूरी है। अभिभावक कम उम्र के ऐेसे बच्चों के व्यवहार को देखकर अगर ऑटिज्म की कर सकें तो उनकी मदद की जा सकती है। जिला अस्पताल बलौदाबाजार में ऑटिज्म बीमारी के प्रति अभिभावकों को बराबर जागरूक किया जा रहा है।
अस्पताल पहुंचने वाले ऐसे मरीजों के संबंधियों और समाज में बीमारी के प्रति जागरूकता लाने का प्रयास किया जाता है। बीमारी से पीड़ित बच्चों के अभिभावकों को बाल रोग विशेषज्ञों और मनोचिकित्सकों द्वारा ऑटिज्म के विभिन्न पहलुओं के बारे में जानकारी दी जाती है, जैसे- ऑटिज्म से पीड़ित और सामान्य बच्चों में अंतर, ऑटिज्म बीमारी से ग्रसित बच्चों का व्यवहार आदि।
इस बीमारी के लक्षण को जितनी जल्दी पहचानकर उपचार कर लिया जाता है, इसके ठीक होने की संभावना उतनी ही ज्यादा होती है। चूंकि ऑटिज्म व्यक्ति के मानसिक विकास मे किसी कारणवश अवरूद्धता होने के कारण होती है। इसके प्रारंभिक लक्षणों को बच्चे के 2 से 3 वर्ष की उम्र में पहचाना जा सकता है। निम्हांस से प्रशिक्षित चिकित्सा अधिकारी, नोडल आफिसर राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम डॉ. राकेश कुमार ने बताया “ऑटिज्म एक दिव्यांगता है जिसमें दिमाग सूचनाएं एवं शब्द सही से प्रेषित नहीं हो पाते हैं। बच्चे को समझने, हाव-भाव दिखाने और बोलने में तकलीफ होती है। ऑटिज्म मानसिक या एक तंत्रिकातंत्र विकृति (न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर) है, जो बोलने, लिखने, दूसरों के साथ व्यवहार करने की क्षमता को बाधित कर देता है। ज्यादातर यह बच्चों में होता है, लेकिन यह किसी भी उम्र के लोगों को प्रभावित कर सकता है। इसके लक्षण हर बच्चे में अलग-अलग नजर आते हैं। शुरूआत में लक्षणों को पहचान कर इलाज शुरू कराएं तो बीमारी से पीड़ितों की मदद की जा सकती है। ऐेसे बच्चों एवं सभी प्रकार की दिव्यांगता के लिए जिला अस्पताल में परामर्श और उपचार उपलब्ध है।“
मिल रही इलाज सुविधा – राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम अंतर्गत जिला चिकित्सा बलौदाबाजार में निम्हांस से प्रशिक्षित चिकित्सा अधिकारी डॉ. राकेश कुमार (नोडल आफिसर राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम) एवं क्लिनिकल साइकोलोजिस्ट मोहिन्दर घृतलहरे पदस्थ हैं। इनकी टीम के द्वारा वर्ष जनवरी 2020 से मार्च 2022 तक कुल 95 की पहचान एवं उपचार किया गया। इनमें से ऑटिज्म के चार, अटेंशन डिफिशिएंट, हाइपर एक्टिविटी डिस्ऑर्डर (एडीएचडी) के 27, इंटेलेक्चुअल डिएब्लिटी के 41 एवं सेलिब्रल पॉलिसी के 23 मरीज थे। विशेषज्ञों का मानना है कि ऑटिज्म से प्राभावित बच्चों की पहचान पूरी तरह नहीं हो रही क्योंकि जागरूकता की कमीं है। पालकों में जागरूकता हेतू प्रशिक्षण दिया जा रहा है। साथ ही व्यापक प्रचार-प्रसार भी किया जा रहा है।
ये लक्षण दिखे तो हो जाएं सतर्क- विशेषज्ञों ने बताया कि “बच्चे में यदि आवाज लगाने पर भी बच्चा अनसुनी कर दे, बच्चा अकेले और गुमसुम रहने लगे, सामान्य बच्चों की बजाए विकास धीमा होना, आंखों में आंखे डालकर बात करने से बच्चा घबराए, अपनेआप में खोया रहे, या किसी भी विषय पर अपनी प्रतिक्रियाएं देने में भी काफी समय लेना आदि लक्षण दिखे तो अभिभावकों को सतर्क हो जाना चाहिए। ऐसे में फौरन चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए। ये मानसिक बीमारी ऑटिज्म संभावित है। इसलिए इसका इलाज जितनी जल्दी शुरू कर दी जाए उतने अच्छे परिणाम मिलते हैं।“
क्या है ऑटिज्म – ऑटिज्म एक प्रकार की मानसिक या न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है, जो बोलने, लिखने, दूसरों के साथ व्यवहार करने की क्षमता को बाधित कर देता है। इसे ऑटिस्टिक स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर कहते हैं। इस बीमारी के लक्षण बचपन से ही बच्चे में नजर आने लगते हैं। इस बीमारी में बच्चे का मानसिक विकास ठीक तरह से नहीं हो पाता है। इस बीमारी से जूझ रहे बच्चे दूसरे लोगों के साथ घुलने-मिलने से कतराते हैं।
2 अप्रैल को मनाया जाता है ऑटिज्म जागरूकता दिवस- 2 अप्रैल ‘वर्ल्ड ऑटिज्म अवेयरनेस डे’ (विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस) के रूप में मनाया जाता है.। इस गंभीर बीमारी के प्रति लोगों में जागरूकता जगाने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 2 अप्रैल को ऑटिज्म जागरूकता दिवस (ऑटिज्म अवेयरनेस डे) मनाया जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है साल 2007 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने हर साल 2 अप्रैल को वर्ल्ड ऑटिज्म अवेयरनेस डे मनाने का ऐलान किया था।
