बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में एक अभूतपूर्व स्थिति पैदा हो गई है, जहाँ एक मामले की सुनवाई के दौरान न केवल एक जज ने पारिवारिक संबंधों के चलते खुद को अलग किया, बल्कि सीधे तौर पर मुख्य न्यायाधीश (CJ) द्वारा जारी किए गए एक सर्कुलर को चुनौती भी दे दी। न्यायमूर्ति संजय एस. अग्रवाल और न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की खंडपीठ ने स्पष्ट रूप से संकेत दिया कि प्रशासनिक आदेशों के नाम पर न्यायिक स्वायत्तता में दखल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
भतीजी वकील, चाचा जज: शुचिता के लिए छोड़ा केस
मामला तब गरमाया जब न्यायमूर्ति संजय एस. अग्रवाल की कोर्ट में उनकी अपनी सगी भतीजी, अधिवक्ता शिवांगी अग्रवाल, एक वरिष्ठ वकील की जूनियर के तौर पर पेश हुईं। हालांकि वह पहले भी इस केस में दिख चुकी थीं, लेकिन इस बार खंडपीठ ने “पेशेवर आचरण और शिष्टाचार” का हवाला देते हुए इसे नैतिकता का मुद्दा बनाया। कोर्ट ने साफ कहा कि निष्पक्षता केवल होनी नहीं चाहिए, बल्कि दिखनी भी चाहिए। जजों ने लंबी सूची गिनाते हुए स्पष्ट किया कि सगे रिश्तेदारों को संबंधित जज की बेंच के सामने खड़ा भी नहीं होना चाहिए, ताकि न्याय की शुचिता पर कोई उंगली न उठा सके।
‘बेंच हंटिंग’ सर्कुलर पर जजों का वार: “यह हस्तक्षेप है!”
असली धमाका तब हुआ जब खंडपीठ ने 16 अप्रैल को मुख्य न्यायाधीश द्वारा जारी उस सर्कुलर पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की, जो तथाकथित “बेंच हंटिंग” को रोकने के लिए लाया गया था। इस सर्कुलर में वकीलों और जजों के रिश्तों को लेकर सख्त हिदायत दी गई थी और जजों से ‘लिखित कारण’ मांगने की बात कही गई थी।
खंडपीठ ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे अदालत के कामकाज में सीधा हस्तक्षेप करार दिया। जजों ने तीखे शब्दों में कहा:
“यह तय करने का विशेषाधिकार सिर्फ संबंधित पीठ (Bench) का है कि कब अपवाद बनाया जाए और प्रक्रिया कैसे चले। प्रशासनिक परिपत्रों के जरिए न्यायिक विवेक को बांधना उचित नहीं है।”
टकराव की स्थिति: अब गेंद मुख्य न्यायाधीश के पाले में
जजों ने न केवल मामले की सुनवाई से खुद को अलग किया, बल्कि इस पूरे विवाद को ही मुख्य न्यायाधीश के सामने भेजने का निर्देश दे दिया। यह आदेश सीधा संदेश है कि उच्च न्यायालय के भीतर ‘प्रशासनिक आदेश’ और ‘न्यायिक स्वतंत्रता’ के बीच एक लकीर खींच दी गई है।
अब देखना यह होगा कि मुख्य न्यायाधीश की ओर से इस “न्यायिक आपत्ति” पर क्या रुख अपनाया जाता है। क्या बेंच हंटिंग रोकने की कोशिशें रंग लाएंगी या जजों का यह कड़ा रुख सर्कुलर की रूपरेखा बदल देगा?

