कंजेक्टिवाइटिस से बचने आंखों को ना छूएं, बरतें सावधानी…

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कंजेक्टिवाइटिस से बचने आंखों को ना छूएं, बरतें सावधानी…

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– बदलते मौसम और तेज धूप में करें आंखों की विशेष देखभाल

रायपुर. 6 अप्रैल, 2022, बदलते मौसम और गर्मी में लू का खतरा तो रहता ही है। ऐसे मौसम में सर्वाधिक खतरा कंजक्टीवाइटिस (जिसे आम बोलचाल की भाषा में आंख आना भी कहते हैं) होने का होता है, आंखें अनमोल हैं और इनकी सुरक्षा बेहद जरूरी है। इसलिए आंखों को ना छूकर तथा अच्छे किस्म के चश्मों का प्रयोग कर आंखों को काफी हद तक कंजेक्टिवाइटिस संक्रमण से बचाया जा सकता है।

वरिष्ठ नेत्र रोग विशेषज्ञ एवं राज्य नोडल अधिकारी अंधत्व निवारण समिति, डॉ. सुभाष मिश्रा के मुताबिक कंजेक्टिवाइटिस का समय से उपचार न कराने पर यह गंभीर हो सकता है। बीमारी की वजह से आंख में सूजन आ जाती है। ऐसे में पीड़ित को नेत्र रोग विशेषज्ञ से उपचार लेना चाहिए।

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डॉ. मिश्रा का कहना है “कंजेक्टिवाइटिस आंखों की आम बीमारी है, जिसे हम आंख आना भी कहते हैं। यह संक्रामक बीमारी है जो संपर्क से फैलती हैI अतः अपनी आंखों को हाथ नहीं लगाना चाहिए। आवश्यक हो तो हाथों को साबुन से धोकर या फिर सेनेटाईज करके ही आंखों को छूना चाहिए। तेज धूप में घर से बाहर निकलने पर गॉगल्स या चश्मा लगाना बेहद जरूरी है। यह ना सिर्फ आंखों को सुरक्षित रखता है बल्कि तेज धूप, धूल और संक्रमण से भी बचाव करता है।“

कंजेक्टिवाइटिस और प्रकार- कंजेक्टिवाइटिस (आँख आना) (या गुलाबी आंख) कंजाक्टीवा एक प्रकार का सूजन है जो पारदर्शी श्लेष्म झिल्ली आंख के सफेद हिस्से को कवर करती है। इस बीमारी के कई प्रकार हैं

बैक्टीरियल कंजेक्टिवाइटिस – बैक्टीरिया एक-दूसरे के संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने, दूषित सतहों के संपर्क में आने या फिर अन्य साधनों जैसे साइनस या कान में संक्रमण के माध्यम से फैल सकता है ।

वायरल कंजेक्टिवाइटिस – वायरल कंजेक्टिवाइटिस गुलाबी आंख (पिंक आई) का एक और सामान्य प्रकार है जो संक्रमित से छींकने और खांसने से फैल सकते हैं। यह आम वायरल ऊपरी श्वसन संक्रमण जैसे कि खसरा, फ्लू या सामान्य सर्दी के साथ भी हो सकता है ।

एलर्जिक कंजेक्टिवाइटिस -आंखों की एलर्जी के कारण लाल आंख होना भी आम है। आंखों की एलर्जी पोल्लेन (पराग), जानवरों की रूसी और धूल के कण सहित एलर्जी से उत्पन्न हो सकती है ।

गैर-संक्रामक कंजेक्टिवाइटिस – यह कंजेक्टिवाइटिस आंखों की जलन पैदा करता है। यह कई स्रोतों से हो सकता है, जिसमें धूम्रपान, डीजल का धुआं, इत्र और कुछ रसायनिक पदार्थ का संक्रमण शामिल हैं।

फंगल कार्नियल अल्सर का भी खतरा- नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. सुभाष मिश्रा ने बताया “फंगल कंजंक्टिवाइटिस” भी कंजेक्टिवाइटिस का एक प्रकार है जो धान कटाई करते समय आँख में धान की पत्ती लग जाने से या पेड़-पौधों से आँख में चोट लगाने से होता है। छत्तीसगढ़ में धान कटाई के समय यह “फंगल कंजेक्टिवाइटिस” बहुत होता है। शुरू में ज्यादा तकलीफ़ नहीं होती तो रोगी देर कर देता है और देरी होने से “फंगल कार्नियल अल्सर” होने का खतरा रहता है। इससे दृष्टिहीनता तक सकती है। डॉ. मिश्रा के अनुसार अंबेडकर अस्पताल में कई मरीज इस बीमारी के चलते काफी दिनों तक भर्ती रहते हैं। बचाव के लिए धान कटाई के समय सादा चश्मा लगाना चाहिए ।

लक्षण- आंखें लाल होना, आंखों से पानी आना, आंखों में जलन होना, चुभन होना, बार-बार कीचड़ आना, पलकों में सूजन और आंखों में दर्द होना मुख्य है।

बचाव- हाथों को आंखों में ना लगाएं। हाथों को साफ करके ही आंखों को छूएं। जलन, खुजली या फिर आंखें लाल होने पर साफ पानी से आंखों को तीन से चार बार धोएं। रोगी से हाथ मिलाने और उसकी उपयोग की चीजें अलग कर इस बीमारी के फैलाव को रोका जा सकता है। आंखों को साफ पानी से धोएं, आंखों को पोछने के लिए साफ कपड़ा या कॉटन का इस्तेमाल करें। एंटीबायोटिक आई ड्रॉप (तीन दिनों तक) दिन में छह बार आंखों में डालें। नेत्र रोग विशेषज्ञ से आंखों की जांच कराएं।

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